स्किनर का क्रिया प्रसूत अधिगम सिद्धान्त b.f. skinner theory in hindi pdf (D el ed notes in hindi, exam-std)

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क्रिया प्रसूत अनुबंधन सिद्धांत के प्रतिपादक B.F Skinner हैं। स्किनर एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थे उन्होंने अपने इस परीक्षण की शुरुआत 1938 में की।अमेरिकी मनोवैज्ञानिक स्कीनर (B.F. Skinner) ने सीखने की प्रक्रिया के स्वरूप को समझने के लिए सर्वप्रथम दूसरे मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए प्रयोगों के निष्कर्षों और सिद्धांतों का अध्यन किया और उन्होंने पावलोव के प्रत्यावर्तन (Reflex Action) और पुनर्बलन (Reinforcement) संप्रत्यय को समझा. उसके उपरान्त उन्होंने स्वतंत्र रूप से प्रयोग किए

स्किनर का क्रिया प्रसूत अधिगम सिद्धान्त के दूसरे नाम

1-सक्रिय अनुबंधन का सिद्धांत
2-अभिक्रमित अनुदेशन का सिद्धान्त
3-नैमित्तिक अनुबंधन का सिद्धान्त
4-कार्यात्मक प्रतिबद्धता का सिद्धान्त
5-R-S Theory
6-Skinner R-S Theory of Learning

स्किनर का क्रिया प्रसूत अधिगम सिद्धान्त (exam-std)
इस संदर्भ में स्किनर ने दो प्रयोग किये उन दो प्रयोगो में – पहला प्रयोग उन्होंने चूहे पर तथा दूसरा कबूतर पर किया था

BF स्कीनर का चूहे प्रयोग (Skinner experiment on Rat)
स्कीन्नर ने अपना पहला परीक्षण सन 1938 में चूहे पे किया | उन्होंने चूहा को बंद करने के लिए एक पिंजड़ा बनवाया, उस पिंजड़े के बनावट कुछ खास प्रकार की थी पिंजड़े में चूहे को अंदर करने के लिए दरवाजा था इसके अंदर एक स्थान पर एक लीवर फिट था और लीवर को दबाने से भोजन की नली का रास्ता खुल जाताजिससे ऊपर रखा हुआ भोजन इस रास्ते से भोजन की प्लेट में गिर जाता था. इस पिंजड़े को स्कीन्नर बॉक्स के नाम से जाना जाता हैं |
स्कीन्नर ने इस बॉक्स में एक भूखे चूहे को अंदर कर दिया और उसने देखा कि चूहे ने अंदर जाते ही उछल-कूद करना शुरू कर दिया. इस उछल-कूद के दौरान एक बार चूहे का पंजा अचानक उस लीवर पर पड़ गया और भोजन उसकी प्लेट में आ गया |उसने भोजन प्राप्त किया और अपनी भूख मिटाई. इससे उसे बड़ा संतोष मिला. अब उसे जब फिर कुछ खाने की इच्छा हुई तो उसने पुनः उछल-कूद करना शुरू किया. इस उछल-कूद में वह लीवर पुनः दब गया और उसने भोजन प्राप्त किया. स्कीनर ने देखा कि भोजन मिलने से चूहे की क्रिया को पुनर्बलन (Reinforcement) मिला. उसने इस चूहे पर यह प्रयोग कई बार दोहराया और देखा कि एक स्थिति ऐसी आई कि भूखे चूहे ने पिंजरे में पहुंचते ही लीवर दबाकर भोजन प्राप्त कर लिया. दूसरे शब्दों में उसने लीवर दबाकर भोजन प्राप्त करना सीख लिया |

स्कीनरका कबूतर पर प्रयोग (Skinner experiment on Pigeon) exam-std
स्किनर ने सीखने के सिद्धांत को स्पष्ट करने के लिए अपना दूसरा प्रयोग 1943 में एक कबूतर पर किया उन्होंने इस प्रयोग के लिए एक विशेष प्रकार का बॉक्स बनवाया. इस बॉक्स में एक ऐसी ऊंचाई पर जहां कबूतर की चौंच जा सकती थी वहां एक प्रकाशपूर्ण चाबी (Key) लगाई गई. इस चाबी के दबाने से कबूतर के खाने के लिए दाना मिल सकते थे. साथ ही इसमें 6 प्रकार के प्रकाश की ऐसी व्यवस्था की गई थी कि भिन्न-भिन्न बटन दबाने से भिन्न-भिन्न प्रकाश होता था. इस बॉक्स को कबूतर बॉक्स (Pigeon Box) के नाम से जाना जाता है।
स्कीनर ने इस बॉक्स में एक भूखे कबूतर को बंद कर दिया. इसके बाद इसकी चाबी (Key) में सबसे हल्के रंग का प्रकाश पहुंचाया गया. जिससे उसकी चमक से कबूतर उसकी ओर खींचा और उसने उसके इधर-उधर चोंच मारी. एक बार उसकी चोंच प्रकाशित चाबी (Key) के ऊपर लग गई, उसके दबते ही उसे खाने के लिए दाने मिल गए. उस कबूतर पर यह प्रयोग 6 प्रकार की प्रकाश व्यवस्था पर किया गया. स्कीनर ने देखा कि प्रकाश में परिवर्तन करने से कबूतर के अनुक्रिया में थोड़ा परिवर्तन हुआ परंतु भोजन मिलने से उसके सही जगह चोंच मारने की क्रिया को पुनर्बलन मिला और एक स्थिति ऐसी आई कि जब भी इस कबूतर को भूखा रखने के बाद इस बॉक्स में बंद किया गया वह उस चाबी (Key) को दबाकर भोजन प्राप्त करने लगा. दूसरे शब्दों में उसने चाबी (Key) दबाकर भोजन प्राप्त करना सीख लियाl

यह सिद्धांत पुनर्बलन (Reinforcement) पर विशेष बल देता है. जब किसी प्राणी को किसी अनुक्रिया से सुखद परिणाम प्राप्त होता है तो वह उस अनुक्रिया को बार-बार दोहराता है, इस बार-बार दोहराने की इच्छा उत्पन्न होने को ही पुनर्बलन कहते हैं. जैसा कि कबूतर को बटन दबाने से भोजन प्राप्त होने पर हुआ. स्पष्ट है कि पुनर्बलन, अनुक्रिया का परिणाम है जिससे भविष्य में अनुक्रिया होने की संभावना बढ़ती है. इस सिद्धांत में पुनर्बलन का बड़ा महत्व है इसलिए इसे पुनर्बलन का सिद्धांत (Theory of Reinforcement) भी कहते हैं.

पुनर्बलन को मनोवैज्ञानिकों ने दो रूपों में विभाजित किया है पहला धनात्मक पुनर्बलन (Positive Reinforcement) एवं ऋणात्मक पुनर्बलन (Negative Reinforcement) और दूसरा प्राथमिक पुनर्बलन (Primary Reinforcement) एवं गौण पुनर्बलन (Secondary Reinforcement) के रूप में

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धनात्मक पुनर्बलन (Positive Reinforcement)– धनात्मक पुनर्बलन उसे कहते हैं जो किसी उद्दीपक की उपस्थिति से मिलता है जैसा कि भूखे कबूतर को भोजन से मिला

ऋणात्मक पुनर्बलन (Negative Reinforcement) -ऋणात्मक पुनर्बलन उसे कहते हैं जो किसी उद्दीपक की अनुपस्थिति से मिलता है जैसे किसी शिक्षक की अनुपस्थिति में उस शिक्षक से डरने वाले बालक की अनुक्रिया में वृद्धि होना

प्राथमिक पुनर्बलन (Primary Reinforcement)-प्राथमिक पुनर्बलन से तात्पर्य उस पुनर्बलन से होता है जो किसी उद्दीपक से सीधा प्राप्त होता है जैसे भूख, प्यास, काम आदि से प्राप्त होने वाला पुनर्बलन और

गौण पुनर्बलन (Secondary Reinforcement)-गौण पुनर्बलन से तात्पर्य उस पुनर्बलन से होता है जो प्राथमिक पुनर्बलन प्रदान करने वाले उद्दीपक के साथ लगातार उपस्थित होने के कारण प्राप्त होता है; जैसे- भोजन के साथ घंटी की ध्वनि को लगातार सुनने से कुत्ते की अनुक्रिया को पुनर्बलन मिला.

क्रिया प्रसूत अधिगम सिद्धान्त की विशेषताएं (exam-std)
क्रिया प्रसूत अधिगम सिद्धान्त की विशेषताएं निम्न लिखित है
1-यह सिद्धांत क्रियाप्रसूत अनुबंधन पर बल देता है और इस सिद्धांत द्वारा सीखना अधिक स्थाई होता है
2-यह सिद्धांत क्रिया से अधिक क्रिया के परिणाम को महत्व देता है
3-यह सिद्धांत सकारात्मक परिणाम से मिलने वाले पुनर्बलन पर बल देता है जो सीखने वाले की क्रिया को गति देने में सहायक है
4-यह सिद्धांत सीखने की क्रिया में सफलता पर विशेष बल देता है
5-यह सिद्धांत सीखने की क्रिया में अभ्यास पर बल देता है
6-सक्रिय अनुबंधन द्वारा मंदबुद्धि के बच्चों को भी सिखाया जा सकता है

क्रिया प्रसूत अधिगम सिद्धान्त की कमियां (exam-std)
1-यह सिद्धांत पशु-पक्षियों पर प्रयोग करके प्रतिपादित किया गया है इसलिए यह मनुष्य के सीखने की प्रक्रिया की सही व्याख्या नहीं करता
2-यह सिद्धांत बुद्धिहीन अथवा मंदबुद्धि वाले प्राणियों पर लागू होता है एवं बुद्धि, चिंतन तथा विवेक से पूर्ण प्राणियों पर लागू नहीं होता
3-स्कीन्नर ने पुनर्बलन को शक्तिदाता माना है जबकि मनुष्य के सीखने में उद्देश्य प्राप्ति की लगन शक्तिदाता होती है
4-इस सिद्धांत के अनुसार पुनर्बलन के अभाव में सीखने की प्रक्रिया मंद हो जाती है जबकि मनुष्य की सीखने में लक्ष्य प्राप्ति आवश्यक होती है
5-इस सिद्धांत के अनुसार सीखना एक यांत्रिक प्रक्रिया है जबकि मनुष्य के सीखने की क्रिया में बुद्धि, चिंतन, तर्क एवं विवेक की आवश्यकता होती है

स्किनरके क्रिया प्रसूत अधिगम सिद्धान्त की शिक्षा में उपयोगिता (Usefulness of Operant Conditioning Theory in Education)
1-यह सिद्धांत सीखने के लिए उद्दीपक (Stimulus) के स्थान पर प्रेरणा (Motivation) को आवश्यक मानता है इसलिए पढ़ने लिखने वाले बालकों को अभिप्रेरित करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है
2-यह सिद्धांत सीखने में पुनर्बलन को बहुत महत्व देता है इसलिए शिक्षण कार्य में, शिक्षक द्वारा शिक्षार्थियों को पुनर्बलन देने में इसका उपयोग किया जाता है
3-शिक्षार्थियों की सफलता के लिए उन्हें क्रियाशील रखने हेतु इस सिद्धांत का उपयोग किया जाता है
4-सक्रिय अनुबंधन का प्रयोग समस्यात्मक बालकों के व्यवहार में वांछित परिवर्तन करने के लिए किया जाता है

शिक्षा में क्रिया प्रसूत अनुबंधन सिद्धान्त की उपयोगिता (Importance of Operant Conditioning Theory in Education)
स्किनर का क्रिया प्रसूत अनुबंधन सिद्धान्त (R-S Theory) शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण भाग हैं। वर्तमान शिक्षण-प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने हेतु स्किनर के इस अधिगम सिद्धान्त का उपयोग शिक्षा में निरंतर किया जा रहा हैं। छात्रों की उचित अनुक्रिया पर प्रत्येक शिक्षक पुनर्बलन के रूप में कक्षा में उस छात्र की सराहना करता हैं। जिससे उन्हें ऐसे ही आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा एवं शक्ति प्राप्त होती हैं।

स्किनर का यह सिध्दांत छात्रों का कुशल संज्ञानात्मक विकास करता हैं। जो उन्हें भविष्य में उचित मार्ग की ओर ले जाता हैं। यह सिद्धांत छात्रों को अभ्यास एवं क्रिया के मार्ग की ओर प्रेरित करता हैं। जिससे वह स्वयं करके सिखने की ओर अग्रसर होते हैं।

स्किनर का क्रिया प्रसूत अधिगम सिद्धान्त का निष्कर्ष (Conclusion of skinner theory)

स्किनर का क्रिया प्रसूत अनुबंधन सिद्धान्त (Skinner R-S Theory of learning) उद्दीपन के स्थान पर अनुक्रिया और पुनर्बलन को महत्व देता हैं और अपने किये समस्त परीक्षणों के माध्यम से स्वभाविक क्रिया की सहायता से अधिगम करने पर बल देता हैं।

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